इस्तेमाल कैसे करें
- अपनी मासिक इन-हैंड सैलरी डालें, यानी वह रकम जो खाते में आती है।
- अगर घर साझा कर रहे हैं या पति-पत्नी दोनों कमाते हैं, तो दूसरी आय भी जोड़ें।
- तय करें कि आय का कितना प्रतिशत किराए पर खर्च करना है। 30% आम शुरुआत है।
- नीचे का सेक्शन खोलकर EMI और बिजली-पानी जैसे खर्च घटाएं।
फ़ॉर्मूला
हाउसिंग बजट = मासिक आय × प्रतिशत ÷ 100
किराया = हाउसिंग बजट − EMI − बिजली-पानी
भारत में आम सलाह है कि किराया इन-हैंड सैलरी के 25% से 30% के बीच रखें। मुंबई, बेंगलुरु और दिल्ली-NCR जैसे शहरों में यह अक्सर 35% से 40% तक पहुंच जाता है, जिससे बचत पर सीधा असर पड़ता है।
उदाहरण
मान लीजिए आपकी इन-हैंड सैलरी ₹60,000 है और आप 30% चुनते हैं। बजट ₹18,000 बनता है। अगर कार लोन की EMI ₹6,000 है और बिजली-पानी-इंटरनेट पर ₹2,000 जाते हैं, तो आप लगभग ₹10,000 किराया आराम से दे सकते हैं। इसके बाद भी हर महीने ₹42,000 बाकी खर्चों और बचत के लिए बचते हैं।
किराए के साथ आने वाले खर्च
- सिक्योरिटी डिपॉज़िट: दिल्ली-NCR में आम तौर पर 2 से 3 महीने का किराया, जबकि बेंगलुरु में कई जगह 6 से 10 महीने तक मांगा जाता है।
- ब्रोकरेज: अक्सर एक महीने का किराया।
- मेंटेनेंस: सोसाइटी का मासिक चार्ज, जो किराए में शामिल हो भी सकता है और नहीं भी।
- रेंट एग्रीमेंट: आम तौर पर 11 महीने का, स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन का खर्च अलग।
- सामान और शिफ्टिंग: पैकर्स-मूवर्स और नए सामान का एकमुश्त खर्च।
HRA छूट का ध्यान रखें
पुरानी टैक्स व्यवस्था में वेतनभोगी HRA पर छूट ले सकते हैं। छूट इन तीनों में से सबसे कम होती है: असल में मिला HRA; मेट्रो शहरों में बेसिक सैलरी का 50% (गैर-मेट्रो में 40%); या चुकाया गया किराया घटा बेसिक सैलरी का 10%। सालाना किराया ₹1 लाख से ज़्यादा होने पर मकान मालिक का PAN देना पड़ता है। नई टैक्स व्यवस्था में यह छूट उपलब्ध नहीं है, इसलिए किराया तय करते समय अपनी व्यवस्था देख लें।
फ़्लैटमेट और PG का गणित
बड़े शहरों में अकेले पूरा फ़्लैट लेना अक्सर 30% की सीमा तोड़ देता है। दो लोग मिलकर 2BHK लें तो प्रति व्यक्ति किराया काफ़ी घट जाता है, और डिपॉज़िट भी बंट जाता है। PG में किराए में बिजली, खाना और सफ़ाई अक्सर शामिल होते हैं, इसलिए तुलना करते समय सिर्फ़ किराया नहीं, कुल मासिक खर्च देखें। कैलकुलेटर में अपने हिस्से का किराया डालकर देखें कि आपकी सैलरी का कितना प्रतिशत बनता है।
मकान मालिक क्या मांगते हैं
ज़्यादातर मकान मालिक और सोसाइटी पहचान पत्र, पिछले दो-तीन महीने की सैलरी स्लिप, कंपनी का ऑफ़र लेटर या आईडी कार्ड, और पुलिस वेरिफ़िकेशन फ़ॉर्म मांगते हैं। कुछ सोसाइटी में शाकाहारी-मांसाहारी, पालतू जानवर या बैचलर से जुड़ी शर्तें भी होती हैं, इसलिए घर देखने से पहले पूछ लेना समय बचाता है।
किराए पर घर लेने से पहले
पहले महीने की कुल नकदी जोड़ें: डिपॉज़िट, पहला किराया, ब्रोकरेज और शिफ्टिंग। एग्रीमेंट में सालाना बढ़ोतरी का प्रतिशत, नोटिस पीरियड और डिपॉज़िट वापसी की शर्तें ज़रूर पढ़ें। ऑफ़िस से दूरी भी जोड़ें, क्योंकि सस्ता घर अक्सर ज़्यादा किराया-भाड़ा और समय मांगता है।
यह पेज सामान्य जानकारी है, वित्तीय सलाह नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सैलरी का कितना हिस्सा किराए पर खर्च करना चाहिए?
आम सलाह है कि इन-हैंड सैलरी का 25% से 30%। बड़े शहरों में यह 35% तक जा सकता है, पर तब बचत घट जाती है।
₹50,000 सैलरी पर कितना किराया सही है?
30% के हिसाब से लगभग ₹15,000, और EMI या बिजली-पानी के खर्च घटाने पर इससे कम।
क्या मेंटेनेंस किराए में गिना जाए?
हां। कैलकुलेटर में उसे अलग खर्च के रूप में डालें, ताकि बजट सही बने।
HRA छूट कैसे मिलती है?
पुरानी टैक्स व्यवस्था में तीन में से सबसे कम रकम पर छूट मिलती है। नई व्यवस्था में यह छूट नहीं है।
सिक्योरिटी डिपॉज़िट कितना होता है?
शहर के हिसाब से 1 से 10 महीने के किराए तक। बेंगलुरु में सबसे ज़्यादा और दिल्ली-NCR में आम तौर पर 2 से 3 महीने।
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